मधुमेह या डायबिटीज मेलाईटस (diabetes mellitus), जिसे आयुर्वेद में “प्रमेह” के नाम से भी जाना जाता है,  का नाम किसी के लिए भी आज नया नहीं है। हर किसी की जुबान पर डायबिटीज बीमारी का नाम है, और हो भी क्यों न? यह बीमारी सारे विश्व में तेज़ी से पैर पसार रही है। इस बीमारी में एशिया विश्वभर में सबसे आगे है और हमारा भारत देश एशिया में दूसरे नंबर पर । ऐसे में हर किसी के जुबान पर इस बीमारी का नाम होना एक आम बात है।
रक्त में शुगर या ग्लूकोज का लेवल बढ़ जाने से डायबिटीज होती है। ऐसा नहीं है कि शुगर पूरी तरह से हमारे शरीर के लिए गैर-जरूरी पदार्थ है, अपितु यह तो शरीर के लिए एक ऊर्जा का स्त्रोत है और यह शुगर हमें सिर्फ चीनी या मीठे से ही नहीं बल्कि भोजन से भी प्राप्त होती रहती है। लेकिन इसकी अधिकता डायबिटीज को जन्म देती है। हमारे देश के लोगों में डायबिटीज या मधुमेह एक बेहद आम बीमारी बन गई है। हर एक-दूसरा व्यक्ति इस बीमारी से परेशान है। अब वक़्त आ गया है इस बीमारी को गंभीरता से लेने का वरना यह हमें इसके काफी सारे घातक परिणाम भी भुगतने पड़ सकते हैं। इससे छुटकारा पाने की पहल करना बेहद जरूरी है और इसके लिए सबसे पहले डायबिटीज के बारे में जागरूक होना जरूरी है। तो आइये जानते हैं डायबिटीज के बारे में:

क्या है मधुमेह या डायबिटीज (What is Diabetes?)

 
डायबिटीज एक खतरनाक बीमारी ही नहीं है, बल्कि कई असाध्य बीमारियों की जन्मदाता भी है। यह बीमारी हमारे शरीर में अग्नाशय या पैंक्रियाज (Pancreas) द्वारा इंसुलिन का स्त्राव कम या बंद हो जाने के कारण होती है। पैंक्रियाज पाचन में सहायता करता है, और एक हॉर्मोन “इन्सुलिन (Insulin)” रक्त में स्त्राव करता है। इन्सुलिन का काम शरीर में रक्त द्वारा ग्लुकोज़ को शरीर के सभी भागों में पहुँचाना होता है। जब कभी किन्हीं कारणों से शरीर में इन्सुलिन उचित मात्रा में नहीं बनती या अपना कार्य सही ढंग से नहीं करती है। उस स्थिति में ग्लुकोज़ रक्त द्वारा शरीर के अन्य भागों में नहीं पहुँच पाता है, और उसका स्तर (level) शरीर में बढ़ जाता है। यह स्थिति “डायबिटीज” या “प्री-डायबिटीज” का कारण बनती है।
 

क्या है प्री-डायबिटीज (What is Pre-diabetes?)

 
प्री-डायबिटीज वह स्थिति है जब आपकी बॉडी में ग्लुकोज़ का लेवल हाई (high) तो होता है, लेकिन इतना नहीं की उसे डायबिटीज बीमारी का नाम दिया जाए। इसका मतलब है कि आपमें डायबिटीज टाइप 2 के साथ ह्रदय रोग और स्ट्रोक (stroke) होने की अधिक सम्भावना है या अगले कुछ वर्षों में आपको ये बीमारियाँ हो सकती हैं। अच्छी बात यह है की अगर आपका वजन अधिक है तो मोटापा कम कर, अपनी लाइफस्टाइल में फिजिकल एक्टिविटी जोड़कर और अपने खानपान में परिवर्तन कर आप इस सम्भावना को खत्म या कम कर सकते हैं।

डायबिटीज के प्रकार (Types of Diabetes)

 
डायबिटीज के मुख्य दो प्रकार हैं, पहली है इंसुलिन आश्रित (Insulin dependent) जिसे हम टाइप–। (type 1)  के नाम से भी जानते हैं।
और दूसरी है इंसुलिन अनाश्रित (Not dependent on Insulin) जिसे हम टाइप-॥ (type 2)  के नाम से भी जानते हैं।

 

क्या है टाइप–। या इंसुलिन आश्रित मधुमेह (Insulin dependent diabetes)

 
पैंक्रियास में इंसुलिन हार्मोन नहीं बन पाता जिससे ग्लूकोज़ शरीर को ऊर्जा भी नहीं दे पाता। आमतौर पर ये बचपन या युवावस्था में होती है। इस प्रकार की डायबिटीज में मरीज़ को रक्त में ग्लूकोज का स्तर सामान्य रखने के लिए नियमित रूप से इंसुलिन के इंजेक्शंस लेने होते हैं। इसका मरीज़ काफी दुबला-पतला होता है।

 

टाइप-॥ या टाइप टू, इंसुलिन अनाश्रित (Not dependent on Insulin)

 
लगभग 90 प्रतिशत रोगी टाइप-॥ डायबिटीज के ही रोगी होते हैं। इसमें पैंक्रियास इंसुलिन बनाता तो है लेकिन कम मात्रा में, इंसुलिन अपना असर खो देती है या फिर ठीक समय पर पैंक्रियास से नहीं निकलती, जिसकी वजह से रक्त में ग्लूकोज़ का स्तर अनियंत्रित हो जाता है। शुरू-शुरू में तो इंसुलिन बनता है और इसकी कमी भी पूरी करता है लेकिन कुछ समय बाद इसमें कमी आ जाती है और मरीज़ को डायबिटीज हो जाती है। परिवार में पहले से ही किसी को डायबिटीज होना इस प्रकार की डायबिटीज का मुख्य कारण हो सकता है। यह आमतौर पर मोटापे से ग्रस्त और वयस्कों पर अपना असर ज्यादा दिखाती है।

 

इसके अलावा और भी कुछ प्रकार हैं, जैसे 

* कुपोषण जनित मधुमेह (Malnutrition-related diabetes/मालन्यूट्रिशन रिलेटिड डायबिटीज मेलाइटस ) – 15 से 30 वर्ष के किशोर और किशोरियों में कुपोषण से ग्रस्त होने के कारण इस प्रकार की डायबिटीज देखी जाती है।
*इंपेयर्ड ग्लूकोज टोलरेंस (Impaired glucose tolerance/IGT) – इस अवस्था में वैसे तो रोगी में मधुमेह के लक्षण नजर नहीं आते, लेकिन भविष्य में मधुमेह होने की आशंका जरुर बढ़ जाती है।
*जैस्टेशनल डायबिटीज (Gestational Diabetes) – यह गर्भावस्था के दौरान होने वाली डायबिटीज है। 2-3% गर्भावस्था में ऐसा होता है। इसके दौरान माँ को और माँ से बच्चे को डायबिटीज हो जाती है। अधिकतर केस में यह गर्भावस्था के बाद ठीक हो जाती है।
*सैकेंडरी डायबिटीज (Secondary Diabetes) – अन्य रोगों के साथ डायबिटीज हो तो उसे सेकेंडरी डायबिटीज कहते हैं।

डायबिटीज के लक्षण (10 Diabetes Symptoms)


*ज्यादा भूख लगना, मुंह सूखना और ज्यादा प्यास लगना
*अधिक भोजन लेने के बाद भी दुर्बल होना
*बिना वजह वजन कम होना (2 या 3 महीनों में ही 6 से 8kg)
*थकान के साथ-साथ चिंता और एकाग्रता में कमी, चिड़चिड़ापन
*बार-बार मूत्र त्यागना (खासकर यदि रात में 3 से ज्यादा बार उठना पड़ें )
*आँखों की रौशनी बेवजह कम हो जाना या धुँधली होना (blurry vision)
*योनि में खुजली होना (yeast (Candida), other fungal infections)
*शरीर के घाव भरने में देरी
*अंगों का सुन्न पड़ना
*त्वचा के रोग होना जैसे खुजली, गर्दन के आसपास, बगलों में त्वचा का काला पड़ना (acanthosis nigricans)

कैसे पता करें कि आपको डायबिटीज है (Diagnosis Tests)? (How to Diagnose Diabetes?) 

अगर आपको ऊपर दिए हुए लक्षणों में से कोई भी लक्षण ज्यादा वक़्त तक नजर आता है, तो ऐसे में शायद आपको डायबिटीज हो सकती है और संदेह होने पर फिजिशियन से सम्पर्क करें। फिजिशियन आमतौर पर दो तरह के टेस्ट की सलाह देगा। जिसमे एक फास्टिंग ब्लड टेस्ट है इसके बाद भोजन के बाद ब्लड टेस्ट किया जाता है और दूसरा एक यूरिन टेस्ट भी है।

किसी विश्वसनीय पैथोलॉजी से अपने ब्लड में ग्लूकोज लेवल की जाँच करा लें।

आमतौर पर खून में ग्लूकोज की सामान्य मात्रा 70 mg/dl से 100 mg/dl के बीच होती है। अगर आप डायबिटीज के बॉर्डरलाइन (“प्री-डायबिटिक”) पर हैं, आपका ब्लड शुगर लेवल 100 mg/dl से 125 mg/dl के बीच होना चाहिए। अगर यह स्तर 126 mg/dl से ऊपर है, तो आपको डायबीटीज है।

आखिर में! ! ! यदि आप इस भयंकर बीमारी से बचकर रहना चाहते हैं, तो मीठे पदार्थों से दूरी बना लें और नियमित रूप से अपने ब्लड में शुगर लेवल की जाँच कराते रहें।